Aarogya Anka

आयुर्वेद दुनिया का प्राचीनतम चिकित्सा प्रणाली है Ιऐसा माना जाता है की बाद मे विकसित हुई अन्य चिकित्सा पद्धतियों मे इसी से प्रेरणा ली गई है Ιकिसी भी बीमारी को जड़ से खत्म करने के खासियत के कारण आज अधिकांश लोग आयुर्वेद के तरफ जा रहे हैΙइस लेख मे हम आयुर्वेद चिकित्सा से जुड़ी हर एक रोग और उसके इलाज के बारे मे बताएंगे Ιआयुर्वेद चिकित्सा के साथ सभी प्रकार के जड़ी -बूटी के बारे मे तथा आयुर्वेद के 8 प्रकारों से हर तरह के रोगों के इलाज के बारे मे बताया गया हैΙ सभी पोस्टों को पढे ओर जानकारी अवश्य ले ताकि आप भी अपना जीवन आरोग्य के साथ healthy बना सके| thanks . 

बच्चों की कुकुरखाँसी(whooping cough) और पेट के कीड़ों(worms) का उपचार

बच्चों की कुकुरखाँसी(whooping cough)

बच्चों के लिए यह बड़ी भयंकर बीमारी है| संक्रामक रोग होने के कारण यदि इस रोग से ग्रस्त बच्चों के साथ स्वस्थ बच्चे खेले तो उन्हे भी यह बीमारी हो जाती है| रोग की प्रारम्भिक अवस्था मे बच्चों को सर्दी और खाँसी होती है| तथा खासते समय कुत्ते के भोंकने जैसे आवाज आती है| इसलिए बहुत लोग इसे “कुकुरखाँसी(whopping cough)” कहते है|

पहले खाँसी की संख्या दिन मे 4-5 बार ही रहती है तथा खाँसते-खाँसते कभी-कभी उलटी भी हो जाती है| यदि शुरू मे ठीक उपचार न किया जाय तो रोग जटिल रूप धारण कर लेता है|खाँसते-खाँसते उलटी,दस्त तथा कभी-कभी मुह,नाक और फेफड़ों से रक्त स्त्राव भी हो जाता है|अंत मे मृत्यु तक हो जाती है|इस  प्राणघातक बीमारी से हजारों बच्चों के जान हर वर्ष जाते है|

कुकुरखाँसी (whooping cough)

एलोपैथिक-चिकित्सकों मे इसके लिए पर्टूसस वेक्सीन (pertussus vaccine)- का इंजेक्सन देते है| उनकी धारणा के अनुसार यह एक मियादी खाँसी है, जिनकी चिकित्सा के लिए कम-से-कम 3 महीने के चिकित्सा की आवश्यकता है| हमारे देश के गरीब जनता के लिए महंगा और लंबा इलाज उपयुक्त नहीं हो सकता | इसकी चिकित्सा सदृश-विधान-चिकित्सा(homeopathy)- से अल्प समय मे तथा कौड़ियों मे सफलतापूर्वक की जा सकती है| 

यह निदान होनेपर भी बच्चे को कुकुरखाँसी है, उसे सुबह खाली परत ड्रसेरा (drosera) 30 शक्ति की 2 गोलियाँ आधा औंस छुआए हुए पानी(distilled water)- मे गलाकर पीला दीजिए तथा 4 दिन तक कोई दवा न दीजिए| आप इसी से देखनेगे की रोग बहुत अंशों तक घट गया|

यदि बच्चा खाँसते-खाँसते दस्त,उलटी कर देता है तो, ‘इपिकाक'(Ipecac) 6 शक्ति की 8 गोलियाँ 2 औंस चुआये हुए पानी मे गलाकर दिन मे 4 बार दीजिए इसी से बच्चा आरोग्य हो जाएगा|

यदि खाँसी का बार-बार तेज दौरा हो, मुंह या नाक से खून निकले , चेहरा नीला पड़ जाय तो कोरेलीयम रुब्रम (coraleium rubrum) 3 शक्ति 2 बूँद 4 औंस चुआए हुए पानी मे जब-तक खाँसी का दौरा ना घटे, 2-2 घंटे पर 1-1 चम्मच देते रहे|

यदि गले मे घड़-घड़ आवाज हो, हिलने-डोलने से खाँसी बढ़े, बच्चा दाँत कड़कड़ाये तो सिना(cina) 30 शक्ति की 8 गोलियाँ 4 औंस चुआए पानी मे गलाकर दिन मे 4 बार दे| 

यदि खाँसी आधी रात के बाद बढ़े ,गले मे दर्द रहे,तो बेलेडोना(balladona) 30 शक्ति की 4 गोलियाँ 2 औंस चुआए हुये पानी मे गलाकर 4 बार दे| 

 इसके अतिरिक्त कुप्रम मेट, ब्रोमीयम , नेप्थेलिन आदि दवाये भी इस खाँसी मे फायदा करती है|

दवा लेते समय चर्बीयुक्त पदार्थ, घी या तेल मे तली चीज़े, सड़े-गले फल, गरिष्ठ पदार्थ, आइसक्रीम, पिपरमिंट की गोलियाँ आदि न देनी चाहिए| यदि बच्चा माता का दूध पिता है तो माता को भी इस उपयुक्त पथ्य से बचना चाहिए| खुशबूदार तेल, सेंट, क्रीम, पाउडर आदि का  व्यवहार बिल्कुल बंद कर देना चाहिए| जिन बच्चों को यह बीमारी हो उनके माता-पिता का परम कर्तव्य है की वे अपने बच्चों को स्वस्थ बच्चों मे न खेलने दे, जिससे की रोग दूसरों को न फैल सके | बच्चा स्कूल जाता हो त् उसे स्कूल न जाने दे| 

यदि उपयुक्त बातों का पूर्ण रूप से पालन किया गया तो निश्चय ही इस भयंकर बीमारी से छुटकारा मिल सकता है| विशेषकर रोग की प्रारंभिक अवस्था मे होमियोपैथिक पद्धति उपचार किया गया तो 8-10 दिन मे रोगी अच्छा हो जायगा|

कुपथ्य वश मनुष्य के शरीर मे अनेक प्रकार के कृमि(कीड़े)(worms) पड़ जाते है, जिनके कारण अनेक प्रकार के कष्ट होते है| उन्ही को कृमि रोग कहा जाता है| आयुर्वेद मे इनके 9 भेद कहे गए है| तथापि मुख्य भेद 2 ही होते है-

1. बाहरी कृमि तथा (external worms)
2. भितरी कृमि (internal worms)

अजीर्ण मे भोजन सड़ा-गला बासी भोजन, कुपथ्य भोजन, दिन मे सोना, दूध और मछली, दूध तथा दही और केला आदि नित्य मीठा तथा खट्टा भोजन एवं गरिष्ठ पदार्थों का सेवन आदि इस रोग के प्रमुख कारण है|

लक्षण-

शरीर के भीतर कृमि उत्पन्न हो जाने पर ज्वर, पेट मे शूल , हृदय मे दुःख , जी -मिचलाना , वमनेच्छा , चक्कर आना, दस्त, भोजन मे अरुचि एवं त्वचा का रंग बदल जाना आदि लक्षण प्रकट होते है|बाहरी कृमि शरीर मे खाज-खुजली , दाद, कोढ़ , गांठ, गलगण्ड आदि उत्पन्न करते है|

यहाँ भतरी कृमियों के चिकित्सा का उल्लेख किया जा रहा है| छोटे बच्चे के पेट मे भीतरी कीड़े अधिक होते है| ये कीड़े आकार मे अत्यंत छोटे, सफेद रंग के तथा 36 इंच तक लंबे केंचुए के आकार वाले भी होते है|पाच्छात्य -चिकित्सा के मतसे ये कीड़े 7 किस्मों के होते है| जिनमे से 3 प्रकार के कीड़े अधिक पाए जाते है- 

कीड़े (worms)

1. चुरने या  पिब वर्म या थ्रेड वर्म– ये सूत जैसे पतले तथा आधा अंगुल लंबे होते है| ये बड़ी आंत मे रहते है तथा रेंगकर गुदा पर आ जाते है| जिसके कारण गुदा स्थान पर खुजली होती है| इनकी अधिकता हो जाने पर अनिंद्रा, मिर्गी, कंप , कांच निकलना आदि लक्षण प्रकट होते है| छोटे बच्चे नींद से चौंक पड़ते, रोते-चिल्लाते, वमन तथा पतले दस्त करते एवं पेशाब करके बिस्तर भोगों देते है| ये कीड़े जब बड़ी आयुवाले स्त्री-पुरुष को भी हो जाते है तो पुरुषों मे प्रमेह, स्वप्नदोष तथा स्त्रीओ मे योनि से श्वेत पदार्थ का स्त्राव आदि लक्षण प्रकट होते है|

2. कद्दू दाने अथवा’ टेप  वर्म’ नामक कीड़े विभिन्न आकारों के 1-2 इंच लंबे तथा बड़े कीड़े 5-8 इंच लंबे होते है| ये कीड़े अधिकतर मांसाहारियो के शरीर मे होते है| इनके कारण जठराग्नि मंद पड़ जाती है| भूख कम लगती है, त्वचा रूखी हो जाती है, पेट मे दर्द तथा ऐठन एवं पतले दस्त आदि लक्षण प्रकट होते है|

3. केंचुए अथवा’ राउंड वर्म’ नामक कीड़े कुछ पीले-मटमैल रंग के 5-14 इंच तक लंबे होते है| ये प्रायः छोटी आंत मे रहते है|परंतु कभी-कभी आमाशय, जिगर, फेफड़े आदि मे भी प्रवेश कर जाते है| इनके कारण पेट मे दर्द स होता रहता है| पेट बढ़ जाता है, भूख तथा नींद कम लगती है, चेहरा पीला पड़ जाता है, दस्त मे आँव आती है| प्यास अधिक लगती है तथा मुंह से खून आना, खाँसी, यकृत शोथ, पीलिया, मूर्छा आदि लक्षण भी प्रकट होते है| 

कृमियों मे निम्नलिखित आयुर्वेदिक योग देने से लाभ होता है-

1. जैतून के कच्चे तेल को गुदा मे 3 दिन लगाने से बच्चों के कृमि मार जाते है|

2. 1 माशा कमीला को आदि छटांक पानी मे औटाए, 8 वा भाग जल शेष रह जाए तो उतारकर छान ले तथा बालकों को पीला दे, इससे थ्रेड वर्म गिर जाते है| 

3. बच्चों को 6 ग्राम नारियल का तेल पिलाने से उदर कृमि निकल जाते है|

4. छोटी दूध्दी का चूर्ण खाने से बच्चों के उदर कृमियों का नाश हो जाता है|

5. नीम के पतों का रस शहद मिलाकर चाटने से पेट के कृमि नष्ट हो जाते है|

6. बथुए का अर्क निकालकर पीने से भी पेट के कीड़े मर जाते है|

7. मट्ठे मे 3 माशा अजवाइन का चूर्ण मिलाकर पीने से पेट के कीड़े मरकर बाहर निकल जाते है|

8. नारियल का खोपड़ा खाने से उदर के चपटे कृमियों का नाश होता है|

9. एक सप्ताह तक कच्चि गाजर खाते रहने से कृमि मर जाते है|

10. पपीते के 5-7 बीज ताजे पानी के साथ खाने से 5 दिन मे पेट के कीड़े मर जाते है|

11. सूरजमुखी के साढ़े 3 माशा बीजों को पीसकर खाने से पेट के कीड़े मर जाते है और दर्द भी ठीक हो जाता है|

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