Allergy( शितपित)
Allergy (एलर्जी) जिसे आम भाषा मे पित्ती या छपाकी कहते है, को आयुर्वेद मे शीतपित्त रोग के नाम से जानते है|यह रोग प्रायः सर्द-गर्म से होता है, जैसे गर्म कपड़ों या बिस्तर मे से निकालकर एकदम ठंडे चले जाना या रसोई मे खाना बनाकर एकदम से स्नान कर लेना| आदि॥ पेट मे कीड़े होने पर भी ये रोग हो जाते है| कुछ लोगों को सिंथेटिक कपड़े पहनने से, तीव्र रसायनिक सौन्दर्य प्रसाधन सामग्रियों के प्रयोग करने से तथा कुछ आहारद्रव्य या विशेष औषध द्रव्यों के प्रयोग करने से भी यह रोग हो जाता है|
आधुनिक विज्ञान मे इसे allergy के नाम से जानते है| जब कोई शरीर की प्रकृति के प्रतिकूल विजातीय पदार्थ शरीर से स्पर्श करता है या प्रवेश करता है|तो शरीर मे उसके विरुद्ध एक तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है,अर्थात फोरेन प्रोटीन के विरुद्ध शरीर की प्रतिक्रिया या एंटीजन एंटीबाड़ी रिएक्शन होता है|
इस क्रिया के फलस्वरूप हिस्टेमिन नामक रसायन निर्माण होता है, जो उस प्रदेश की रक्तवाहिनियों को फैला देते है, जिसके फलस्वरूप वह लाल-लाल चकते उत्पन्न हो जाते है|फलस्वरूप रक्ताधिक्य के कारण खुजली और लालिमा हो जाती है| इस रोग के मुख्य लक्षण निम्नलिखित है-

1. त्वचा मे चुभन,
2. खुजली एवं,
3. दाने या दाफड़ पड़ जाते है|
खुजली बहुत होती है| फलस्वरूप घबराहट एवं बेचैनी भी हो जाती है|
विस्तृत विचार के बाद यह वास्तव मे स्त्रोतस् दुष्टजन्य विकृति है| सभी रोग मंदाग्नि से होता है| इस रोग मे भी मंदाग्नि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है; क्योंकि आम-विषही स्त्रोतस् मे दुष्टि(दोष या विकार) पैदा करके कफ एवं वायु के द्वारा अनुबंधित होकर शीत पित दाफड़ पैदा करता है| जिनकी जठराग्नि ठीक होती है, उन्हे इस प्रकार के रोग नहीं होते| इस allergy के और भी अनेक कारण हो सकते है| गंभीर होनेपर allergy त्वचा मे एग्जिमा जैसी गंभीर रोगों को भी जन्म देती है|
इसके अतिरिक्त कभी-कभी allergy अपना कार्य क्षेत्र भी बदल लेती है| जैसे त्वचा की allergy श्वसन तंत्र मे भी प्रवेश कर जाती है| फलस्वरूप दमा जैसे रोग हो जाते है| श्वसन तंत्र की allergy मे अधिक छींक आना, नाक मे खुजली , नाक से अधिक स्त्राव निकलना, खाँसी एवं श्वास लेने मे कठिनाई अर्थात श्वास कष्ट जैसे लक्षण मिलते है|
ये लक्षण यदि अधिक दिनतक रहे तथा बार-बार allergy के attackहोते रहे तथा allergy के कारण दूर न हो , उनका बार-बार शरीर संपर्क होता रहे तो उसे allergic ब्रोन्काइटिस कहते है| और तब कष्टदायक रोग श्वास रोग मे बदल जाता है| अतः allergy(एलर्जी) के घातकता को कम नहीं आंकना चाहिए|
Allergy से बचने के उपाय
इस रोग से बचने के लिए आहार एवं विहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए; क्योंकि हर ऋतु मे आयुर्वेद के बताए तरीके से रहन-सहन करने पर मनुष्य रोगों से बच सकता है-
- सर्दियों मे रजाई से उठकर एकदम बाहर न निकले|
- गर्म पानी से स्नान कर, कपड़े पहनकर, शरीर ढककर बाहर निकले|
- गर्मियों मे भी धूप से आकार पसीने से भीगे हुए एकदम स्नान या ठनधि जगह ए0 सी0 आदि मे न जाए|
- ठंडे वातावरण से एकदम धूप मे न जाय|
- विरुद्ध आहार, जैसे- मछली-दूध कभी सेवन न करे|

यदि रोग हो जाता है तो रोगी की मलपरीक्षा(कीड़ों के लिए) भी कराए, कीड़े होनेपर उसकी चिकित्सा करनी चाहिए; क्योंकि अनेक बार पाचन तंत्र के कृमि भी allergy के उत्पादक होते है|
चिकित्सा
इस रोग की चिकित्सा के लिए समान्यतः व्यक्ति antiallergic अर्थात anti हिस्टेमिन नामक गोलियाँ लेता रहता है| कभी-कभी तो स्टीराइड भी लेता है| इस प्रकार की दवाइयाँ एलोपैथी चिकित्सा की होती है|, परंतु यह सफल चिकित्सा नहीं है| आयुर्वेद मे इसकी चिकित्सा का विस्तार मे वर्णन मिलता है|
- सबसे पहले रोगी की मंदाग्नि होने पर जठराग्नि की चिकित्सा करे, जैसे चित्रकादी या त्रिकुट चूर्ण ले|
- कृमि होनेपर कृमिघ्र चिकित्सा जैसे- कृमिकुठार, कृमिमूद्गरस का सेवन करे|
- सोना गेरू को घी मे भूनकर चार-चार रती की 4 बार मधू से चटाये|
- हरिद्राखंड की 1-1 चम्मच भी 2 बार दे|
- शीत-पित्त मंजन भी इस रोग मे बहुत अच्छा काम करता है|
- आँवला और नीम पत्तों का चूर्ण समान मात्रा मे लेकर सेवन करने से अच्छा लाभ होता है|
- आरोग्यवर्धनी कैशोर गुग्गुल की गोलियाँ भी इस रोग मे अच्छा लाभ करती है|
इस प्रकार उपयुक्त औषध आयुर्वेद के परामर्श से लेकर आप allergy रोग के जाल से बच सकते है| चिकित्सा के साथ-साथ पथ्य-अपथ्य भी जरूर ध्यान दे|
पथ्य-
लघु सुपाच्य आहार जैसे- खिचड़ी, दलिया, लौकी,तोरई,टिंडा, मौसम के फल, सब्जी आदि का यथोचित सेवन करे|
अपथ्य-
चाय,दही,चावल,बर्फ,अरबी,केला,उड़द का सेवन कम करे, विदाही, क्षोभक आहार का सेवन भी न करे, सिंथेटिक आहार भी न ले, नमक भी कम खाए|