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1. दारुण शिर:शूल -
कुछ समय पूर्वकी बात है, शिरःशूलका एक रोगी बहुत समय तो इधर-उधर उपाय करता रहा। कोई आराम न मिलनेपर कई नामी चिकित्सकोंसे मिला तथा आतुरालयमें भी पड़ा रहा। अन्ततः आतुरालयमें जब करीब दो मास व्यतीत हो गये तब डॉक्टर साहबने कहा-दिमागमें रसौली (भौंहोंके पास आँखके ऊपर गिल्टी निकलनेका एक रोग विशेष) का दबाव नसपर है। अतः ऑपरेशनद्वारा रसौलीको निकालना पड़ेगा। रोगीकी इतनी हिम्मत नहीं पड़ी और उसके परिवारवाले भी ऑपरेशनके लिये राजी नहीं हुए। दैवयोगसे वह हमारे यहाँ पहुँचा।
बातचीतसे यह लगा कि उसके सिरमें नजलकी कोई गंदगी जमा हो गयी है। उसीसे सिरमें भीषण शूल हो रहा है। अतः शिरोविरेचनार्थ रोगीके सिरके बाल उस्तरेसे साफ कराये गये और सिरके अंदर जो दोप इकट्ठे हो रहे थे, उनको नरमकर नाकसे निकालनेके लिये दवाइयों (पञ्चगव्य) द्वारा सिद्ध घृतमें दूधका खोवा भूनकर सुहाता-सुहाता सिरपर बंधवाया गया और रोगीको कुटी-प्रावेशिक विधिसे गरम कमरेमें कई दिनतक रखा गया। उसके परिचारकोंको समझाया कि रोगीको हर तरह ठंडसे बचाना है। पूरा-पूरा पहरा जरूरी है।
रोगीको प्रतिश्याय सम्बन्धित गरम क्वाथ ही दिये गये या आवश्यकता होनेपर गरम पानी सेवन कराया गया। खानेमें पतला सा शुद्ध घीका हलवा, जिसमें त्रिफला एवं सितोपलादि-चूर्ण मिला था. साधारण मात्रामें दिया गया। हलवा भी बहुत थोड़ा दिन-रातमें केवल तीन बार। इसका यह प्रभाव हुआ कि रोगीके नाकसे पीला पीला पानी बहना शुरू हो गया और सिरका कुछ बोझ भी हलका हुआ।
अगले दो दिनोंके बाद यानी तीसरे दिन रोगीको एक गोली शूलहर और दी गयी। परंतु उसके बाद उसे और गोली नहीं खानी पड़ी। रोगीको सात दिनतक कमरेमें रखा गया। जरूरतके समय भोजन और पानी गरम-गरम ही दिये गये। ठंडी हवाका प्रवेश बंद रखा गया। भोजन उपयुक्त मात्रामें धीरे-धीरे बढ़ाया गया और ईश्वर-कृपासे वह व्यक्ति आज चालीस वर्ष बाद भी ठीक-ठाक है।
क्वाथ-
गुलवनफशा, गाजवान, मुलेठी, काली मिर्च, सौंफ, उन्ताय एवं देशी खाण्डके क्वाथसे दारुण शिरःशूलमें लाभ होता है। रोगीका बलाबल देख कर मात्रा निर्धारित करनी चाहिये।
2. नकसीर(नाक से खून बहना)-
नकसीर शुरू होते ही रोगीके सिरपर ठंडा पानी या भीगा कपड़ा डाल दे। ठंडे पानीसे उसकी नाकको मस्तकसमेत बार-बार धोये। शुद्ध ठंडे पानीमें भिगोकर शुद्ध रूई या कपड़ेको बत्ती बनाकर नाकमें डाले। चिकनी मिट्टीकी डलीपर पानी डालकर सुधाये। खून बहना बंद हो जाता है।
कभी-कभी चोटसे यदि नाकमें व्रण हो गया हो, पिंकी (लाल दवाई) का घोल बनाकर गुलाबी गुलाबी अति गहरा नहीं, वह घोल नाकमें डाले। भीगी रूई या कपड़ेकी बत्ती नाकमें डालनेसे आराम हो जाता है।
बार-बार होनेकी हालतमें ऐसे रोगीके मस्तकपर श्वेत चन्दन, गेरू या आँवलेके ठंडे पानीसे बना पतला-पतला लेप करे। आराम देगा। सौवीर, धात्री, गुलसुर्ख, मुलेठी, सरज खटिक, ठंडे पानीसे गुलकन्द, अर्क केवड़ा, गुलाब या मुण्डी आदिके साथ विकारी, मूँगाभस्म, पेठा, कहरवा, वासावलेह आदि सेवन कराये। अवश्य आराम होगा।
3. जलोदर-
जलोदर एक भयानक रोग अवश्य है, परंतु यदि चिकित्सा शुरूमें ही सिद्धान्तके अनुसार की जाय तो भयंकर स्थिति आने नहीं पाती।
चिकित्सा सूत्र इस प्रकार हैं-
1. रोगीको पानीको जगह सौंफ या मकोयका अर्क दिया जाय, पानी देना ठीक नहीं।
2. नमक बिलकुल न दे। भोजन विना नमक, जौकी रोटी और गायका दूध पीनेको दे। मीठा कम दें, वह भी देशी खाण्डका दे।
3. दवा या भोजन केवल अर्क या दूधके ही साथ दे। कृपया टेपिंग न करावे, रोग लम्बा पड़ जाता है।
4. पुनर्नवा मण्डूर, आरोग्यवर्धिनी यकृत्, प्लीहादिरस, रससिन्दूर, चन्द्रप्रभावटी, नवायसलौह, सिंहनाद गुग्गुल, सौवीरभस्म या पिष्टी, गोक्षुरादि गुग्गुल, पाषाणभेद, सुरभिक्षार, यवक्षार, नरसार, सरजादि-चूर्ण, मूत्रलयोग एवं बलरक्षक योग अमृततुल्य होते हैं। इंजेक्शन भी दे सकते हैं।
~ दूधमें गोमूत्र मिलाकर दें तो बहुत जल्दी आराम होगा। यह अनुभूत सिद्धान्त है।
4. गृध्रसी(सियाटिका)-
गृध्रसी एक बड़ा दुःखदायी और भयानक रोग है। यह वातजन्य अस्सी रोगोंमेंसे एक है, पर इसकी चिकित्सा साधारण वातरोगोंकी तरह प्रायः सफल नहीं होती। अतः इसकी चिकित्सामें कुछ विशेष रीति अपनानेपर ही आराम होता है।
अक्सर कूल्हेमें गृध्रसी होनेपर दर्दके मारे रोगीका चलना-फिरना दूभर हो जाता है। न चलनेसे उसे दूसरे रोग और उपद्रव भी घेर लेते हैं। मानव घरमें बोझ बनकर बैठ जाता है। जीवन अति दुःखदायी हो जाता है। स्टेरायड्स खाते-खाते हड्डियाँ जर-जर होकर टूट जाती हैं। जीवन और भी दुःखद होकर रोगीको जीवनसे ग्लानि हो जाती है।
चिकित्सा सूत्र –
ऐसी स्थितिमें किसी तेल या घीकी मालिश न करे, इससे रोग बढ़ता है। बालूरेत, हल्दी, नमक, रेह, सज्जीखार, सोडा कोइहो सुहागा, नौशादर, थोड़ा-थोड़ा सभी मिला लें। सूखे गोबरका गोहा सबके बराबर मिलाकर बड़ी-बड़ी दो डीली-ढीली पोटली बना ले। एक तवेपर सेंककर दर्दकी जगह रखे और दूसरी तवेपर सेंकनेके लिये रखे। इसी प्रकार सेंक करनेसे रोगीको तुरंत लाभ शुरू हो जायगा।
आराम होनेपर वही पोटली नरम कपड़ेकी तहद्वारा कपड़ेसे बाँध दे।
5. कण्डू (दाद,खाज,चम्बल)-

दस ग्राम गन्धक आँवला सार, बीस ग्राम राल सफेद, दो ग्राम तृतिया (नीला थोथा), चार ग्राम फिटकिरी, आठ ग्राम सुहागा इन सभी वस्तुओंको पीसकर बारीक कपड़छान चूर्ण तैयार करके थोड़े-से पानी, दही या लस्सीके साथ मिलाकर खारिश (खुजली) की जगहपर धीरे-धीरे मालिश करनेसे खारिज ठीक हो जाती है। एक-दो दिन आराम होनेपर भी इसको लगाते रहे ताकि दुबारा न हो जाय।
नोट-इसके लगानेसे यदि जलन रहे तो थोड़ी-सी वेसलीन या पैराफीन लगानेसे तुरंत आराम हो जाता है।
चम्बल या एग्जिमाके लिये इस चूर्णमें दो गुना नाग (सीसा) भस्म मिला ले और पैराफीनमें मिलाकर लगाये।
नोट-दाद, खाज या चम्बल इत्यादिपर किसी साबुनका प्रयोग न करके उसपर मुल्तानी मिट्टी, दही, दूध, गायका गोबर लगाये। धोनेके लिये साफ पानी ले।
वास्तवमें जो अजीर्ण होनेपर भी खानेका लालच करते हैं, उनके जोड़ोंमें कच्चा रस खूनके साथ मिलकर जम जाता है। परिणाम यह होता है कि जोड़ोंके किनारे उस कच्चे रसके जमनेसे सूज जाते हैं और जोड़ोंमें दर्द रहने लग जाता है। हाथ-पैर, घुटने, कन्धे आदि धीरे-धीरे काम करना हो छोड़ देते हैं। किसी-किसीके तो जोड़ इतने उलटेसे भद्दे हो जाते हैं कि देखा नहीं जाता।
ऐसे जोड़ोंपर नमक पानीसे सेंककर महानारायण तेलकी मालिश करे। उसके ऊपर कोई नरम पत्ता जैसे-एरण्ड, पान अथवा धतूरे आदिका लपेटकर रखना चाहिये और खानेमें अजमोदादिवात, अश्वगन्धादि चूर्ण लेना चाहिये। कब्ज हो तो पञ्चसकार चूर्ण, सिंहनाद गुग्गुल या योगराज गुग्गुल आदिका निरन्तर सेवन करना चाहिये। यदि रास्नादि क्वाथके साथ ले तो बहुत शीघ्र आराम हो जाता है। आमवातादि रस, कुंकुमावलेह अथवा कोई गुग्गुल, चन्द्रप्रभावटी, आरोग्यवर्द्धनी आदि भी दी जा सकती है। ठंडे, भारी तथा वातकारक पदार्थोंका सेवन न करे।
7. अजीर्ण से उत्पन्न रोग-
भयंकर अजीर्णसे दारुण उदरशूल, वमन, विरेचन, बार-बार पेटमें गैससे तनाव या जीवनसंकट नजर आये तो घबराइये नहीं, एक गिलास पानीमें मधुक्षार, खानेका सोडा और कुछ कण पिंकी (लाल दवाई-पोटेशियम परमैग्रेट), पाँच-दस बूँद, जिससे पानी गुलाबी हो जाय, घोल बनाकर थोड़ा-थोड़ा पीना चाहिये।
आवश्यक होनेपर एक गिलास और लिया जा सकता है। पीते ही आराम हो जायगा।
8. बालशोष(सुखारोग)-
बालशोष प्रायः गर्भावस्थामें माताका दूषित दूध पीनेसे मोहवश अधिक दूध या भोजनके कारण हो जाता है। अतः बालकको मोहवश भोजनपान न दे और उसे हर समय गोदमें न रखे, खेलने दें।
प्रायः जिगर, तिल्ली बढ़ जाती है, बालक खेलना छोड़कर रोता रहता है, पेट बढ़ता चला जाता है, माता उसे भूखा समझकर बार-बार दूध आदि कुछ-न-कुछ खिलाती रहती है, बालकके पेटके सिवाय सभी अङ्ग सूखते जाते हैं।
चिकित्सासूत्र-
दूषित भोजन, दूध बंद कर दे। शुद्ध भोजन वह भी थोड़ा-सा दे। बालक यदि सो रहा हो तो उसे जगाकर कुछ भी खिलाये पिलाये नहीं, सोना-खेलना ही बालकको ठीक रखता है। रुग्णावस्थामें प्रायः गायका दूध, अरक मकोय या सौंफ मिलाकर दे। अरकमें थोड़ा सुरभिक्षार अवश्य मिला ले। सुरभिक्षार न मिलनेपर बछड़ीका मूत्र मिला ले या बहुत थोड़ा-सा खानेका सोडा मिला ले।
इस रोगके लिये बालशोपहर बालचतुर्भद्र रस अमृतके समान होता है। बालामृत पेय, अरविन्दासव या घुट्टी, शोषहरवटी आदि चिकित्सककी अनुमतिसे अवश्य दे। जब दूधका समय हो जाय और बालक वास्तवमें भूखा हो तभी दूध, अर्क, दवाइयाँ आदि दे। भगवद्भजन सभी रोगोंकी अचूक दवा है।
9. राजयक्ष्मा (टी. बी.)-
अतिभोजन, दुस्साहस अर्थात् अपनी सामर्थ्यसे अधिक परिश्रम करना, लापरवाही, कुसमय भोजन एवं श्वास, शौच, सूत्र आदिके वेगको रोकना, सदाचारहीनता, अति वीर्यपात आदिसे शक्ति क्षीण होकर राजयक्ष्मा हो जाता है। इससे फुफ्फुसमें छेद, खाँसी, ज्वर, निर्बलता, असमर्थता आदि लक्षण होते हैं।
चिकित्सा-remedies
जीवन नियमितरूपसे निर्वाह करे। निम्नलिखित औषधियोंका किसी योग्य अनुभवी चिकित्सककी देखभालमें सेवन करे च्यवनप्राश, लक्ष्मीविलासनारदीय, रसराज जैसे रससिन्दूर, अभ्रकेभस्म, मूँगा-शृङ्गराजभस्म, मुक्ता, सुवर्ण, चाँदी, बंग, शुद्ध केसर, सितोपलादि, तालिसादि, वरीचूर्ण, अश्वगन्धचूर्ण, विदारीचूर्ण, अपामार्गचूर्ण, वला अतिबला-चूर्ण मिलाकर वासावलेह, कुंकुमावलेह, खमीरा गाजवान, जवाहिर मोहरा, अकीक आदि।
यदि वेदना हो तो शुद्ध घी, नारायणतेल, महानारायणतेल, लाक्षादितेल, वलातेल आदि शरीररक्षक योगोंका सेवन करे। वसन्तमालती-रस, वसन्तकुसुमाकर रस, नारदीय महालक्ष्मी विलासरस, च्यवनप्राश, अवलेह, कुंकुमावलेहमें मिलाकर सेवन करे। साथमें शतावरी-सिद्ध दूधका सेवन करे।
इससे खाँसी, नजला, जुकाम, सिरदर्द अथवा छातीका दर्द, बल या सामर्थ्यहीनता, शीघ्र ही ज्वरसहित विदा हो जाते हैं।
उपर्युक्त चूर्णांको घी, खोवा और देशी खाण्डमें मिलाकर पाक बना ले बहुत लाभ देंगे। पीनेमें अश्वगन्धारिष्ट, लोहासव, द्राक्षारिष्ट, दशमूलारिष्ट, पुनर्नवाद्यारिष्ट आदिका सेवन करे।
10. कैंसर(cancer)-
कैंसर एक भयानक रोग है, जो शरीरके किसी भागमें पैदा हो सकता है। यह शोथका एक भेद है, जिसका मूल कारण रक्तपित्त-प्रधानतासे है। इसमें कभी-कभी जलन, कभी शूल और कभी शूल आदि कोई अन्य परेशानी भी नहीं होती।
साधारण शोथचिकित्सासे यह प्रायः कब्जेमें नहीं आता। कुछ रोगियोंको निम्न विधियोंसे दीर्घजीवन और आराम मिला है-
चिकित्सासूत्र – remedies
शोधकी अवस्थामें – इमलीका बीज पीसकर सुहागा, हल्दी, सेंधा नमक, थोड़ा-थोड़ा इमलीचूर्णमें पानी डालकर पुल्टस बनाकर सुहाता- सुहाता प्रतिदिन बाँधनेसे रोगीको आराम और शोथ कम होने लगता है। यदि व्रण हो तो भरता चला जाता है। शूल भी घट जाता है। खानेमें वराटिका, प्रवाल, अकोक, नरसार-मित्रित चूर्ण एक ग्राम काफी है। बलाबल देख करके कुछ ज्यादा भी दे सकते हैं। ब्रेकेटके बीचके द्रव्योंका यथोचित मात्रामें चूर्ण बना ले। धूर्तबोजचूर्ण, हिरमजी, काली मिर्च, सौवीरकी चार मात्रा सुबह, दोपहर, शाम और रातके समय। पीनेके लिये वासकासव, पानीयुक्त तीन बार भोजनके साथ ले। अजीर्णवश किसी-किसी रोगीके पेटमें शूल देखा गया है। ऐसी अवस्थामें कुमार्यासव देनेसे तुरंत शूल घट गया।
किसी-किसी रोगीके गलेसे हलकमें कैंसर होनेकी अवस्थामें रक्तस्राव देखा गया है। प्रायः औषधिसेवन करते ही रक्तस्राव बंद हो गया। ऐसा देखा गया है. घबराये नहीं। ऐसे रोगीको यदि बहुत कमजोरी हो तो अनार खिलायें, उसका रस पिलायें। धीरे-धीरे वल मिलनेपर साधारण रोटी दूधमें भिगोकर खिलाये। लौको, आलू, आँवला, अमरूद, मूली आदि ठंडे या मातदिलमिजाजकी सब्जी अथवा बहुत पतली दाल मूँग (उड़द, चना मिली हुई) दे सकते हैं। दूध सर्वश्रेष्ठ है। अमरूद, आँवला, अनार आदि फल भी स्वास्थ्यवर्धक होते हैं भगवत्कृपासे लाभ होगा।
11. कुकुर कास एवं साधारण कास-
कुकुर कास एक बड़ा दुःखदायी रोग है। यह प्रायः बालकोंमें होता है; क्योंकि वे जहाँसे जो मिले सभी कुछ अज्ञानवश खा-पी जाते हैं।
इस रोगमें बलगम प्रायः गलेमें ज्यादा चिपका रहता है, इसीलिये खाँसी उठती है। खाँसते-खाँसते दम रुकने लगता है, रोगी बहुत बेचैन रहता है। जबतक उलटी होकर बलगम निकल नहीं जाता, साँस नहीं आती।
चिकित्सासूत्र-
रोगीको जो खान-पान दे, उसमें कोई लेसदार और खट्टी, तीखी, चटनी वगैरह तथा खुश्की करनेवाली खुराक या दवा न दे। हर चीज तरावट देनेवाली मीठी तथा स्वादिष्ठ हो। प्रायः जो दवाइयाँ साधारण खाँसीमें देते हों, उनमें भी बहुत थोड़ा-सा उपयुक्त मात्रामें लेसको दूर करनेवाला कोई खार-जैसे नौसादर, जौखार, अपामार्गक्षार आदि मिलाकर दें। औषधि आराम करेगी। अजमोदादि कण्ठ, नरसार, शहद और खाँड़से या वरा सितोपलादि यवक्षार और देशी खाँड़ मिलाकर गरम पानीसे या तालीसादि चूर्ण अपामार्ग क्षार खाँड़, शहद मिलाकर या शृङ्गधादि चूर्णमें नरसार शहदमें मिलाकर चटायें या एलादि चूर्ण, सौभाग्यचूर्ण शहद और खाँड़में मिलाकर चटायें या वासकादि कास चूर्णमें यवक्षार और शर्वत वनकशामें मिलाकर चढ़ायें।
इसी प्रकार पीनेमें द्राक्षारिष्टमें नरसार मिलाकर भोजनके साथ या बादमें पानी मिलाकर पिलायें। इसी तरह खदिरारिष्ट या दशमूलारिष्ट या कोई और आसव अथवा अरिष्ट भी प्रयोग करें। वासकासव थोड़ा गरम पानी मिलाकर सेवन करायें। आराम होगा। खानेमें बासी रखा हुआ, खराव हुआ भोजन कभी न दें। ताजा गरम मीठा, जायकेदार थोड़ा-थोड़ा भोजन सेवन करायें। कड़वा, खट्टा, कसैला, लाल मिर्चवाला, लस्सी, दही, खटाई वगैरह ठीक नहीं। हवादार तेज सर्दी या गरमीसे बचें।
ठीक समयपर शौच ठीक नहीं होता, पेट तना-सा ही रहता है, बार-बार शौच जाता है, शौच थोड़ा सा होकर बंद हो जाता है, मन प्रसन्न नहीं होता। इस कब्तका मूल कारण रूक्ष भोजन, व्यायाम न करना, निठल्ला पड़ा रहना आदि है।
चिकित्सासूत्र-
चोकरसमेत आटेकी रोटी खायें। दूध मीठा लें, शक्कर गुड़ प्रायः पेट साफ रखते हैं।
सब्जियोंमें पत्तीसमेत मूली, काली तोरई, घीया, बैगन, गाजर, परवल, पपीता, टमाटर आदि। दालें छिलकेसमेत लें। पतली बनवायें।
रातको अधिक मौठा दूध जरूर लें। खूब व्यायाम करें, चलें, कूदें, खुश रहें, चिन्ता न करें। फिर भी दवाकी जरूरत हो तो थोड़ा-सा खानेका सोडा पानीमें घोलकर पी जायें तो पेट हलका रहेगा और शौच भी।
इमलीका गुड़ डालकर मीठी चटनी सेवन करें, पेट साफ रहेगा। बैंगन बनायें, आराम देगा। भोजनके साथ टमाटर लें, नमक पेट साफ रखता है। कभी कभी थोड़ा-सा पञ्चसकार चूर्ण भी ले लें। द्राक्षासव, सैन्धवादि चूर्ण पेट हलका रखता है। भोजनके बाद
सौंफ-मिश्री चबानेसे पेट ठीक रहता है। चित्रकादि वटी खाते ही तुरंत लाभ होता है। किशमिश, त्रिफला, अभयारिष्ट बहुत अच्छे हैं, पेट हलका हो जाता है। सिंहनाद गुग्गुल दूधसे रातको ले, आराम रहेगा। भीजनके साथ कुमार्यासव, द्राक्षारिष्ट अथवा पुनर्नयाधारिष्ट ले। मधुके साथ रोटी खानेसे पेट साफ रहता है। भीकुमारकी सब्जी रोजाना ले तो पेट साफ रहेगा। बथुवेका रायता या साग, इमलीकी चटनी, नीबूसे रवाकर पत्तोंसमेत खाये। पेट साफ रहेगा। अमरूद, पका हुआ केला, टमाटर, बेर, परवल, बैंगन, पपीता, अंगूर, अंजीर, आलूबुखारा, मुनक्का, आडू, उन्नाभआदिका सेवन करे। कब्ज दूर रहेगा।
13. बवासीर(अर्श) piles-
प्रायः ठीक समय अथवा शौचका वेग होनेपर शौच न जानेके कारण यह रोग पनपता है एवं रूक्ष, पेटमें खुश्की, ऋब्त करनेवाला भोजन या उचित समयपर ऊटपटांग चीजें खानेसे पेट या यकृत्-जिगर खराब होनेसे यह रोग हुआ करता है।
शौचमें लापरवाही होनेसे गुदामें सूजन होकर मस्से हो जाते हैं। शौचके समय दर्द आदिसे बड़ा कष्ट होने लगता है। अतः रोगी हाजत होते हुए भी कष्टसे डरकर शौच नहीं जाता। परिणाम यह होता है कि शौचके साथ खून भी आने लगता है। रोगी कमजोर होने लगता है और बेचैन रहता है।
चिकित्सासूत्र- remedies
समयपर शौचसे निवृत्त जरूर होओ। कभी हाजत मत रोको। अजीर्ण और कब्ज करनेवाला भोजन मत करो। सारा दिन केवल बैठनेमें मत गुजारो, थोड़ा व्यायाम अवश्य करो, जिससे शरीर और खास
तौरपर पेट ठीक रहे। कम-से-कम शौचादिसे निवृत्त होकर सीधे खड़े होकर बार-बार पैरोंमें जमीनपर हाथोंको लगाओ। टाँगें चौड़ी करके दायाँ हाथ बायें पैरमें एवं बायाँ हाथ दाँयें पैरपर बार-बार लगाओ। हर बार सीधे जरूर खड़े रहो, जिससे पेटमें हरकत हो। एक ही जगह खड़े-खड़े जैसे भाग रहे हो काफी समयतक दौड़ते रहो। पेट हलका रहेगा, कब्ज दूर होगी। सुबह-शाम घूमने जाओ। दौड़ लगाओ, खेलो, सुस्ती दूर करो। चाट, पकौड़ी, तली चीजें मत खाओ, इनसे रोग बढ़ता है।
remedies
शौचके समय बवासीरपर कासीसादि घृत या कासीसादि तेल जितना अंदर हो सके अवश्य लगाया करो, दर्द घटता जायगा, रोग दूर होगा।
खानेमें सैन्धवादिचूर्ण, नवायस प्राणदाचूर्ण, आरोग्यवर्धनी वटी ले। मुरब्बेकी हरड लोहभस्म के साथ ले, सिद्ध हरीतकी, मण्डूरभस्म अथवा पुनर्नवा मण्डूर चार-चार गोली दिनमें दो-तीन बार छाछके साथ सेवन करे।
भोजनके साथ कुमार्यासव या अभयारिष्ट अथवा पुनर्नवाद्यारिष्ट या लोहासव, द्राक्षारिष्ट आदि थोड़ा पानी मिलाकर भोजनके बीचमें अथवा तुरंत बाद ले। बहुत जल्दी आराम होगा। शरीर बलवान् होगा।