cancer(कैंसर)-
जगतमें आज दिन-दिन कैंसर(cancer) का विस्तार बहुत बढ़ रहा है। ‘वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाईजेशन’ के एक सर्वेक्षणके अनुसार हर पाँच व्यक्तिमॅसे एक व्यक्तिको कैंसर होता है। इतने व्यापक रोगसे अनजान रहना, मानव-जीवनको खतरेमें डालने जैसा है। प्रत्येक व्यक्तिको कैसरका स्वरूप, पूर्वरूप, कारण और कैसरकी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। इस दृष्टिसे यहाँ कैंसरका संक्षिप्त विवेचन किया जा रहा है-
1. शरीरके विभिन्न अड्डोंमें कैंसर-
मस्तिष्कसे ग्रीवातक जितने भी अङ्ग हैं, उन सबमें जैसे ओष्ठ, जिहा, काकड़ा (टान्सिल), मुख, गला, नाक, आँख, कान, तालु, चमड़ी आदि-इन सब अङ्गोंमें कैंसर हो सकता है।
इसमें पहले निम्न चिह्न दिखते हैं一
(1) किसी भी प्रकारके दर्द बिना बढ़ती हुई ग्रन्थि।
(2) कोई भी ड्रेसिंगसे हीलिंग न होवे, ऐसा अल्सर।
(3) लम्बे समयके बाद ग्रन्थि और अल्सरमें दर्द शुरू होता है और बढ़कर ग्रीवासे मस्तिष्कतक फैलता है।
(4) खुराक-निगलनेमें तकलीफ।
(5) कभी-कभी पानी और अन्य प्रवाही पदार्थ
भी गलेसे नीचे नहीं उतर सकता।
(6) आवाज बदल जाती है।
(7) बधिरता भी आ सकती है।
(8) दर्दके स्थान नाक, मुँह आदिसे खून बहता है।
(9) दर्द जबतक ठीक नहीं होता, तबतक सर्दी खाँसी रहती है।
2. फेफड़े मे कैंसर(cancer)-
सौ वर्ष पूर्व फेफड़ेका कैंसर बहुत अल्प मात्रामें था। परंतु अब यह सबसे अधिक दिखता है और अधिकतर करके चालीससे ऊपरकी स्रायुमें अधिक देखनेको मिलता है।
इसके कुछ कारण इस प्रकार हैं-
(1) अफीम, चरस, गाँजा सेवन करनेवालोंको
यह कैंसर तम्बाकू पीनेवालेसे दस गुना अधिक करता है।
(2) इस कैंसरका प्रमुख कारण बीडी, सिगरेट चिलम आदि रूपसे तम्बाकूका सेवन माना जाता है।
(3) स्वयं तम्बाकू सेवन करनेवालेको तो कैंसर होता है, मगर बीडी, सिगरेट, तम्बाकू पीनेवालेके पास सहनेवालेको भी हवामेसे साँसके साथ फेफडेमें पहुंचता हुआ धुआँ कैंसर उत्पन्न कर सकता है।
(4) सीमेन्ट और सीमेन्टके अन्य उद्योगोंमें काम करनेवाले मनुष्योंको यह कैंसर हो सकता है।
(5) एक्स-रे किरणोंसे भी कैंसर होता है|
(6) निकल क्रोमीयम, फ्लोरोमिथाईल, ईयर, सल्फ्यूरस स्मोक (गन्धकयुक्त धुआँ), दूषित हवा, लम्बे समयसे चलता हुआ टेलीविजन और पुरानी खाँसीसे भी कैंसर होता है।
(7) कपड़ोंकी मिलोंमें काम करते हुए लोगोंके श्वसनसे रूईके सूक्ष्म तन्तु फेफड़ेमें जाकर कैंसर उत्पन्न कर सकते हैं।
(8) पत्थरकी खानोंमें काम करनेवाले मजदूरोंको भी इसी तरहका कैंसर हो सकता है।
(9) किसी भी प्रकारका कचरा लगातार फेफड़ेमें जाकर कैंसर उत्पन्न कर सकता है।
यह कैंसर एक फेफड़ेमें भी और दोनोंमें भी एक साथ हो सकता है। कभी-कभी फेफड़ेमें प्राणवायु लेकर आनेवाली नाड़ियाँ भी इसे एक जगहसे दूसरी जगह ले जाती हैं। यह कैंसर दो फेफड़ोंके बीच Pleura, Chest wall, Pericardium में भी फैल सकता है। फेफड़ेके ऊपरके भागमें बढ़कर यह मेरुदण्डमेंसे निकलती नसोंको भी दबाता है। यह छाती और गरदनके Lymph nodes में भी फैलता है। वहाँसे पसलियोंकी हड्डी, खोपड़ी और भुजाओंकी हड्डियोंमें भी फैलता है। यह कैंसर Osteolytic होता है। यह फैलकर किडनीकी ऊपरकी ग्रन्थिमें (adrenals) दिमागमें, दूसरे फेफड़ेमें, लीवरमें, किडनीमें और हार्टके ऊपर भी पहुँच सकता है।
हृदय के फेफड़ों मे कैंसर(cancer) का पूर्वरूप-
(1) इस कैसा पहले कोई ज्यादा शिकायत वहीं रहती, परंतु खाँसी चलती रहती है। एक्स-रे करानेसे मालूम होता है कि फेफडेमें कैंसर है।
(2) शरीरमें बाल और वजन कम होता रहता है।
(3) लगातार खाँसीकी शिकायत रहती है।
(4) बलगम मवाद या खून संयुक्त आता है।
(5) छातीमें दर्द और भारीपन।
(6) साँस लेनेमें कष्ट।
(7) छातीमें पानी भर जाना।
(8) यह कैंसर बढ़कर अगर अन्न-नलीको दबाता है तो खाने-पीनेमें भी तकलीफ हो सकती है।
यह कैंसर फैलकर दिमागमें भी जा सकता है।
इनके लक्षणमें मस्तिष्क-दर्द, वमन, नसोंका तनाव, कमजोरी, पेरालिसिसका असर भी हो सकता है। यह हड्डियोंमें और लीवरतक भी पहुँच सकता है। इसमें निम्न अन्य लक्षण भी होते हैं-
– Clubbing हाथ-पैरके नाखून Club जैसे दिखते हैं। कैंसर ठीक होनेसे ये नाखून फिर नार्मल भी हो सकते हैं।
– यह कैंसर शरीरकी लम्बी हड्डियोंके अग्र भागपर नयी हड्डीका सर्जन करता है, पर बहुत दर्द होता है।
-इस कैंसरसे शरीरकी सब प्रकारकी ग्रन्थियोंमें भी कैंसर फैल सकता है।
– इस कैंसरसे शरीर कमजोर और पीला हो जाता है।
– गरदनके ऊपर ग्रन्थियाँ हो जाती हैं। लीवर बढ़ जाता है, शरीरके जोड़ोंमें दर्द होता है। कभी-कभी पैथोलॉजिकल फ्रैक्चर (सहजमें हड्डीका टूट जाना) होता है।
– ग्रन्थिपर स्पर्श करनेसे गरम लगता है।
इस कैंसरमें औषधोपचार- कुशल वैद्यको नाड़ी-परीक्षा करके सबसे पहले प्राकृतिक दोषका शमन करना चाहिये। इस रोगमें कास्टिक और रासायनिक द्रव्योंका संयोजन अनिवार्य होता है। बलगममें खून आता है तो उसे सर्वप्रथम बंद करना आवश्यक है। इसमें सबसे सरल उपाय है-हरी वासा पत्तीका रस पच्चीस ग्राम और बकरी का दूध २५ ग्राम मिलाकर प्रातः-सायं पिलाना चाहिये। जेष्ठीमधु, उदुम्बर, वरुण, कांचनार आदिके साथ रसायन औषधमें नागभस्म, अभ्रकभस्म, प्रवालपिष्टी, श्रृंगाधक, श्रृंगभस्म, मुक्तापिष्टी, हीराभस्म और सुवर्णभस्मका संयोजन रोगीका बलाबल देखकर करना चाहिये। कांचनार गुग्गुल और त्रिफला गुग्गुल भी इसके साथ संयोजन करनेसे अच्छा परिणाम आता है।
छातीका कैंसर (Breast Cancer) –
यह कैंसर ज्यादा करके स्त्रियोंको होता है। इस कैंसरकी ग्रन्थि वातप्रधान होती है तो सख्त, खींची हुई और काले रंगको दिखती है। पित्तप्रधान ग्रन्थिमें जलन होती है, स्पर्शसे गरम लगती है। लाल या पीले रंगकी होती है और बहुत कम समयमें पक जाती है। अगर कफप्रधान-ग्रन्थि होती है तो यह वेदनायुक्त, सख्त होती है और धीरे-धीरे बढ़ती है। यह कैंसर पाश्चात्त्य देशोंमें ज्यादा है।
यह जिन स्त्रियोंके बच्चे नहीं होते उनको होनेकी सम्भावना ज्यादा रहती है। 47 वर्षकी आयुके पहले जो स्त्रियाँ ओवरी और गर्भाशय निकलवा देती हैं, उनके लिये इस कैसरकी सम्भावना कम हो जाती है। स्थूल शरीरमें एड्रीनल ग्रन्थि बढ़ती है, यह Estragen में बदल जाती है और सोनेमें जाकर कैंसरकोष उत्पन्न करनेका कारण बनती है। ज्यादा चुस्त कपड़े पहननेसे वहाँकी चर्बी मृत हो (मर) जाती है। चोट लगनेसे भी चर्बी मृत हो जाती है। यह भविष्यमें कैसरमें बदल जाती है।
– वर्थ-कन्ट्रोल करनेवाली दवाई भी कैंसर कर सकती है।
– पुरुषोंमें छातीमें हारमोन्स असंतुलित होनेसे मसल्स बढ़ जाते हैं और वे बादमें कैंसरका रूप धारण कर सकते हैं।
– खूनमें स्टेरायड्स बढ़ जानेसे ब्रेस्ट कैंसर हो सकता है। वहाँसे यह कैंसर थाईरोईड, ओवरीज, युटेरस, कोलोरेफ्टम, मेनेन्जीस और दिमागके आवरणतक फैल सकता है। वह चमड़ी, चेस्टपोल, पसलियों काँख गरदनमें छातीके बीच फैल सकता है। इनके द्वारा हड्डियोंमें लीवर फेफड़े और बेईजमें जा सकता है।
इस कैसरमें छः महीने पहलेसे छातीमें गठि निकलनी शुरू होती है। उसमें दर्द आदि कुछ नहीं होता। सूजन और सुजनवाले भागमें लाल रंग हो जाना कैसरका चिह्न है। सातो रक्तमिश्रित साव निकलनेसे कपडेमें दाग होते हैं। कभी-कभी घाव पक भी जाते हैं। बाहरको ओरसे पत्थर-जैसे सख्त होते हैं। नीपल और चमड़ी अंदरकी तरफ खिंची हई हो जाती है। समय बीतनेपर उसमें अल्सर हो जाता है। हाथमें बड़ा सूजन, काँखमें गाँठें होकर यह कैंसर एडवान्स हो जाता है। रोगीका वजन दिन-दिन कम होता रहता है। खाँसो और कफमें खून आनेकी शिकायत रहती है। साँस फूलती है, बेचैनी होती है और हड्डियोंमें दर्द होता है।
उपचार-
रोगीका बलाबल देखकर उसकी प्रकृतिको ध्यानमें रखकर दवाईका संयोजन करना चाहिये। इस कैसरकी शुरुआतमें इन्द्रपर्णीको जड़का लेप करनेसे ग्रन्थि गल जाती है। साथ-साथ रक्तरोहित, वरुण, कांचनार, सहिजन, उदुम्बर और आपड़की जड़, रेवंची तथा निर्गुण्डीका क्वाथ साथमें कांचनार गुग्गुल देना चाहिये एवं रसायन औषधका भी प्रयोग लाभदायक है।
अन्न-नलीका कैंसर(cancer)-
यह कैंसर मरीजको बहुत दयनीय स्थितिमें ले जाता है। शुरूमें खाने-पीनेमें तकलीफ होती है, फिर तो बूंद-बूंदको उतारनेके लिये रोगी तरसता है। यह अधिकतर पचास साल ऊपरके लोगोंको होता है। यह कैंसर गरम-गरम खान-पानसे, मुँह दाँतकी अच्छी तरह सफाई न होनेसे और एसीडिक पदार्थसे होता है और वह फैलकर शरीरके किसी भी भागमें जा सकता है। इस दर्दमें खायी हुई थोड़ी खुराक भी वापस आ जाती है। तब अन्न-नलीके नीचेके भागमें कैंसर होता है। कफ बढ़ता है। आवाज बदल जाती है। कफके साथ खून भी निकलता है, छातीमें दर्द रहता है। खूनकी उलटी भी हो सकती है।
जठरका कैंसर(cancer)-
सामाजिक और आर्थिक गरीबीसे यह कैंसर होता है। ‘ए’ ब्लड ग्रुपवाले मनुष्योंमें यह ज्यादा दिखता है। स्टार्च, अचार, बहुत गरम खुराक, प्रीजर्व की हुई खुराक, शराब और तम्बाकू कैंसर के कारण होते हैं। अपच, गैस, एसीडिटी समय रहनेसे विटामिन ‘बी 12’ कम हो जाने भयह तकलीफ हो सकती है। अगर एसीडिटीक शिकायत ज्यादा होती है तो कैसर ठीक होने शक्यता बढ़ती है। मगर एसीडिटी कम होती है तो जा ज्यादा बिगड़ा हुआ होता है। क्रोनिक गेस्ट्रीक अत्या भी आगे जाकर कैंसर में बदल सकता है। जठरका भी ऑपरेशन बाकीके जठरके लिये कैसरकी सम्भावन दोसे छः गुना कर देता है।
इसमें रोगीको खुराक बहुत कम हो जाती है। यह अन्य किसी भी कैंसरको तरह फैल सकता है। इस कैंसरसे आकस्मिक दस्त और उलटीमें खून आता है। जैसा खुराक खाया हुआ होत है, वैसा ही उलटीसे निकल जाता है। दस्तमें काला खुर आता है। रोगीके शरीरमें बहुत पीलापन आ जाता है।
लीवर-कैंसर (cancer)-
यह कैंसर लीवर सीरोसीसमे ज्यादा करके होता है। प्राईमरी लीवर कैंसर कम होते हैं। Hepatoma और Cholangio Carcinoma यह दो प्रकारके कैंसर बड़ी उम्रवालेको होता है और बच्चोंको Hepatoblastoma नामक कैंसर होता है। ये सब प्रकारके कैंसर लीवरके दाहिने भागमें होते हैं। कई बार पूरे लीवरमें छोटी-छोटी ग्रन्थियाँ भी होती हैं। एक बड़ी गाँठ भी हो सकती है। मगर Filrolamellar Carcinoma ज्यादा करके लीवरके बायें भागमें होता है, इस प्रकारकी गाँठ एक किलोग्रामसे ज्यादा वजनकी भी होती है।
इसको भयानकता यह होती है कि यह लीवरको निकम्मा करके मरीजको मार डालती है। यह कैंसर फैल करके लीवरसे फेफड़ेमें तुरंत पहुँच जाता है। इसकी शुरुआतमें रोगीकी हलकी-सी शिकायत रहती है। यह शिकायतें अगर तुरंत समझमें न आ जायें तो डेढ़ महीने जितने समयमें ही रोगीका जीवन समाप्त हो सकता है। इस कैंसरके लक्षण निम्न प्रकारके होते हैं-
(1) रोगीका वजन 5 से 10 किलोग्राम कम हो जाता है।
(2) पेटमें दर्द दाहिनी ओर और बीचमें ऊपरकी तरफ होता है। आकस्मिक रूपसे कभी सख्त दर्द हो जाता है। उस समय कैंसरको गाँठ फट सकती है। कभी रक्तवाहिनीको तोड़कर पूरे पेटमें खून भर देती है।
(3) भूखका मर जाना लीवरके कैसरके ३३ प्रतिशत लोगोंमें देखनेको मिलता है।
(4) बुखार-इस कैसरसे शरीरमें बुखार आता है, दो या तीन हफ्तेतक अन्य दवाईसे ठीक नहीं होता, तब जानना चाहिये कि लीवर कैसरमें रसी हो गयी है। या फिर लीवर कोष ही खत्म हो गये हैं।
मरीजको देखते समय लीवर बढ़ा हुआ, स्पर्शमें कठिन और खुरदरा दिखता है। नाखूनका फ्लबींग देखनेको मिलता है। इस दर्दके बढ़नेसे पीलिया हो जाता है। मरीजके पेटमें पानी भर जाता है।
पेन्क्रियास कैंसर(cancer)-
यह कैंसर शरीरमें आस पासके अवयवोंमें फैल जाता है तथा फैलकर लोवर, हड्डियों, चमड़ी, फेफड़े और अन्य सब जगह पहुँच सकता है। यह दूसरे अवयवमें फैलनेके बाद ही मालूम पड़ता है। इसमें भूख मर जाती है। बड़ी उम्रवाले लोगोंमें भारी, दुर्गन्धयुक्त दस्त, खुराकमें लौ गयी चर्बी पाचन हुए बिना मलके साथ निकल जाती है तो जानना चाहिये कि यह सब कारण पेन्क्रियास कैंसरका है।
बड़ी उम्रमें डायबिटीज और वजनका कम होना दोनों साथमें दिखता है तो भी पेन्क्रियास कैंसर हो सकता है। इसमें दस्त या उलटीमें खून आनेकी शिकायत हो सकती है। हाथ-पैरके तलोंमें बहुत खुजली आती है। उसका लीवर और प्लीहा बढ़ जाता है। उदर और पीठमें दर्द रहता है।
यहाँ शरीरके विभिन्न अवयवोंमें देखे गये कैंसरोंका उल्लेख किया जा रहा है-
(1) ओष्ठका कैंसर,
(2) नाकके पीछेके भाग-तालुका कैंसर,
(3) काकडेका कैंसर,
(4) लारोत्पादक पिण्डका कैंसर,
(5) गरदनका कैंसर,
(6) जीभका कैंसर,
(7) फेफड़ेका कैंसर,
(8) छातीका कैंसर,
(9) अन्न-नलीका कैंसर,
(10) स्टमकका कैंसर,
(11) लीवरका कैंसर,
(12) पेन्क्रियासका कैंसर,
(13) बड़े आँतका कैंसर,
(14) रेक्टमका कैंसर,
(15) गुदाका कैंसर,
(16) किडनीका कैंसर,
(17) यूरीनरी ब्लेडर कैंसर,
(18) प्रोस्टेट कैंसर,
(19) पीनाईल कैंसर,
(20) टेस्टोक्यूलर कैंसर,
(21) गर्भाशयग्रीवाका कैंसर,
(22) युटेरीन बॉडीका कैंसर,
(23) ओवरीयन कैंसर,
(24) न्यूरोलॉजिक ट्यूमर्स,
(25) थाईराईड कैंसर,
(26) हड्डीका कैंसर,
(27) बच्चोंको होता हुआ कैसर- (अ) एबोज सारफोमा, (ब) रेटीना ब्लास्टोमा, (स) नेफ्रो ब्लास्टोमा, (द) न्यूरोप्लास्टोमा,
(28) चमड़ीका कैंसर,
(29) नीवस-कैसर,
(30) लीम्फोमा कैंसर,
(31)ब्लड कैंसर।
जिस प्रकार शरीरका अपना स्वतन्त्र रूप होता है, उसी प्रकार रोगके भी अपने स्वतन्त्र रूप होते हैं। शरीरमें कैंसर शरीरके रक्त, मांस, धातुसे पुष्ट होकर अपना रूप बना लेता है और समग्र शरीरमें जीवनीय कोषोंके पास अपने कोषको लगा देता है। फिर जीवनीय कोषोंको मारकर शरीरके किसी एक अङ्गमें दिखायी देता है। वह सूजन, गाँठ, अल्सर-जैसे रूपोंमें होता है। शनैः शनैः शरीरके सब मर्म-भागोंमें अपना स्थान जमा देता है। वह वात, पित्त और कफको दुष्ट करके खून, मांस और धातुको बिगाड़कर फैलता जाता है। प्रथम वह चमड़ीके नीचे फैलता है, इससे निदानमें देर हो जाती है।
आयुर्वेदमें इसके निम्न प्रकार दिखते हैं-
(1) वातप्रधान,
(2) पित्तप्रधान,
(3) कफप्रधान,
(4) त्रिदोषजन्य,
(5) मेदप्रधान,
(6) रुधिरजन्य,
(7) मांसजन्य,
(8) द्विदर (गाँठ-पर-गाँठ होना)।
(9) शिरोजन्य,
याद रखें कि कैंसर आनुवंशिक और चेप फैलानेवाला नहीं है। आयुर्वेद हमेशा रोगीकी चिकित्सा नाड़ी परीक्षाके द्वारा प्रकृति देखकर दोषशमन और रोग-शमनार्थ औषध-मिश्रण परिणाम देता है। कैंसरको काबूमें करनेके लिये प्रत्येक अवयवको ध्यानमें रखकर औषधियोंका संयोजन करना चाहिये। शरीरके
प्रत्येक अवयवको ठीक करनेकी अनुभूत औषधियाँ आयुर्वेदमें दी हई हैं। उन औषधियोंके साथ कैसरको ठोक करनेवाली औषधियोंका संयोजन करके मरोजको देवेसे ठोस परिणाम मिलता है। जैसे दिमाग ब्रेनका कैंसर है तो बाह्यी शंखपुष्पी जटामांसी आदि औषधियोंके साथ वरुण, रक्तरोहित, भल्लातक, कस्तूरी, वज्रभस्म, सुवर्णभस्म, मुक्तापिष्टी, अभ्रकभरमका योग्य मात्रा मिश्रण करके साथमें कांचनार, गुग्गुल आदिका उपयोग करना चाहिये। मरीजका बलाबल देखकर बलप्रद दवार्ड-औषध संयोजित की जाय। इस प्रकारसे इस रोगका उपचार किया जा सकता है।